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।। महामृत्युंजय महा-यज्ञ।।

विशेषतः महामृत्यंजय महा-यज्ञ कराने से जीवन में अकाल मृत्यु एवं अपमृत्यु को टालने से लेकर जीवन के प्रत्येक अड़चनों, रूकावटों व मुसीबतो से छुटकारा पाकर सुखी स्वस्थ गृहस्थ जीवन के लिए यह उपाय लाभकारी व प्रभावशाली है।

उदाहरणः कहा जाता है कि मृकण्डु पुत्रस्य मारकण्डेय ऋषि की आयु मात्र 5 वर्ष की थी। उन्होनें मात्र 5 ही वर्ष की आयु में मुकण्डु ऋषि की यह होनहार सन्तान ने 4 वेद 6 शास़्त्र 18 पुराणों का अध्ययन कर लिया था। ऐसा कि मुकण्डु जानते थे कि हमारा पुत्र मारकण्डेय मात्र 5 वर्ष ही जीवित रहेगा। 5वां वर्ष पूरा होने को आया तो मारकण्डेय जी के माता-पिता के आंखो से आसुओं की धार निकलने लगी जिसको देखकर के मारकण्डेय जी ने अपने पिता एवं माता से बड़े विनम्र भाव से पूछा की भावीवश हमसे अगर कोई गलती हुई है तो हमें क्षमा करते हुए उसका पश्चाताप बतायें। अगर उस पश्च्ताप को करने में मेरा जीवन भी समाप्त हो जाये तो मै करूंगा। ऐसा सुनने के बाद मृकण्डृ ऋषि ने अपने पुत्र को अपनी गोद में लेकर कर बड़े भाव से कहने लगे कि तुम्हारे जैसा पुत्र पाने के बाद मै ही नहीं मेरा कुल धन्य हो गया सपने में भी तुमसे कभी कोई गलती हुई होती तो मै तुम्हें बताता। फिर मारकण्डेय ने कहा की क्या कारण है ऐसे मलीन भाव से आपलोग चुपचाप बेठें हैं। तब विवश होकर मृकण्डु जी ने अपने पुत्र से बताया कि आज से तीसरे दिन में तुम्हारी मृत्यु हो जायेगी। मारकण्डेय जी ने पूछा तो क्या होगा। तब उन्होने बताया कि तुम उस जगह चले जाओगे जहां से मनुष्य दोबारा वापस नहीं आता। उन्होने पूछा हमें यहां से कौन ले जायेगा। उन्होनें भारत वर्ष के उत्तर प्रदेश राज्य में गाजीपुर जिले में एक प्राचीन शिव-मन्दिर में जाकर शिव-लिंग की तरफ इशारा करते हुये कहा कि आजे से तीसरे दिन यही तुम्हे अपने साथ ले जायेंगे। इतना सुनने के बाद मरकण्डेय जी ने सबकुछ छोड़कर दोनो हाथो से शिव-लिंग को पकड़ कर रूदन करने लगे। उनके रूदन की धार से उस लिंग का अभिषेक होने लगा। और उनके अन्तर आत्मा से महामृत्युंजय मंत्र का उच्चारण होने लगा। तीसरा दिन होते ही यमराज के दूतों ने मारकण्डेय जी के प्राण का हरण करने के लिए आ गये; ज्यों ही यम के दूत ने मारकण्डेय जी के प्राण को हरना चाहा त्यों ही भगवान शिव के त्रिशूल ने यम के दूत के वाहन भैसे के सिर को काटकर धड़ से अलग कर दिया। तब यम के दूतों ने भगवान शिव से प्रार्थना कि आप विधि के विधान में परिवर्तन कर रहे है क्यों, तब भगवान भोलेनाथ ने यम के दूतो से कहा कि इस बालक की आयु 5 वर्ष है तो हमारी आयु का 5 वर्ष कम करके इस बालक की आयु में जोड़ दिया जाये। जो भी भक्त इस मंत्र का श्रद्धा विश्वास पूर्वक यज्ञ अनुष्ठान करेगा या करायेगा तो उसकी आयु में अवश्य वृद्धि होगी। इतना वचन बोलने के बाद भगवान शिव ने मारकण्डेय जी को अमरत्व का वरदान देते हुये अपने लोक को गये। तब से यह स्थान मारकण्डेय जी के नाम से जाना गया। जहां पर गंगा और गोमती का संगम है। जैसे कि आपकी जानकारी के लिए बताया जाता है कि अश्वथामा, बलिराजा, कृपाचार्य, विभिषणः, हनुमन्तो, परशुरामश्च, वेदब्यास यह सप्त ऋषि चिरंजीवि थे। आठवें चिरंजीवि मारकण्डेय जी हुये, इन्होनें बहुत सारे ग्रन्थों व पुराणों की रचना की और अमरत्व को प्राप्त किया। यह कथा आप सभी सज्जनो को हमे उम्मीद है कि प्रेरणादायी होगी जिससे कि आप लोग भी भाव विभोर होकर इस कथा का अनुसरण करते हुये अपने आप भागवान शिव के चरणानुरागी बनाने के लिए जीवन में सुख भोगकर मोक्ष को पाने के लिए र्प्रेरित हो सके। यही हमारी शुभकामना आपके साथ है।

महामृत्युंजय मंत्र जप यज्ञ से लाभ : महामृत्युंजय मंत्र इंसान के जीवन में हर प्रकार के सुख को प्रदान करने वाला महा मंत्र है। ग्रह आदि शान्ति के लिए भी यह मंत्र बड़ा प्रभावशाली है। मोक्ष आदि की कामना रखने वाले मनुष्य के लिए भी मोक्ष आदि पाने में सहायक है।

महामृत्युंजय मंत्र जप यज्ञ की विधि : महामृत्युंजय मंत्र का सवा लक्ष्य जप कराने के बाद सवा लक्ष्य जप का दशांश हवन, दशांश हवन के बाद दस दिगपाल बलिदान, नौ ग्रह देवताओं के लिए बलिदान, पूर्ण आहूति करने के बाद दशांश तर्पण, दशांश मार्जन और प्रत्येक दिन रूद्राभिषेख करने का विधान है।

जप यज्ञ के लिए वेदी : चर्तुलिंगतोभद्र या द्ववादस लिंगतोभद्र, मण्डल, षोडस मात्रिका मण्डल, नवग्रह मण्डल, वास्तु मण्डल, क्षेत्रपाल मण्डल, पंचाग मण्डल आदि इन मण्डलों पर तैतीस करोड़ देवताओं का ध्यान, आहवन, पूजन करके जप यज्ञ सम्पन्न कराया जाता है।

जप यज्ञ सम्पन्न कराने के लिए ब्राहमणः नौ ब्राहमणों के साथ नौ दिन में सम्पन्न किया जाता है।

निर्देश : कृपया महामृत्युंजय महा यज्ञ को करने वाला ब्राहमण विद्वान होना चाहिए जो जप यज्ञ का शुद्ध उच्चारण कर सके जिससे लाभ की प्राप्ति हो। अगर जप यज्ञ का अशुद्ध उच्चारण हुआ तो तत्काल हानि की प्राप्ति होती है।