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।। नारायण बलि संस्कार।।

विशेषतः नारायण बलि संस्कार मनुष्य के मरणोपरान्त करने का विधान है जो शास्त्र में आता है। ऋषिमुनियों के वचनानुसार यह संस्कार आत्मा को परमात्मा की चरणानुरागी बनाने में विशेष बल देता है। यह संस्कार जीव के अंश पुत्र आदि के द्वारा वैदिक विधि विधान से 13वीं कर्म के बाद किसी शुभ मुहूर्त में किसी सप्त नदी के तट पर या देवालय में करने का विधान है। यह संस्कार हर जीव के निमित करना चाहिए।

उदाहरणः नारायण बलि संस्कार अकाल मृत्यु प्राप्त जीव के लिए अनिवार्य है। कहते हैं कि मनुष्य के जीवन का संसार में बिताया गया प्रत्येक पूर्ण कर्म का फल जीव को बलात्व प्रत्यक्ष दर्शी होकर परमात्मा के समक्ष प्रस्तुत करता है जैसे सार्वजनिक जीवन में किसी भी मुकदमे की पैरवी के लिए वकील की आवश्यकता होती है। बिना एलएलबी की डिग्री प्राप्त किए हुए मनुष्य के द्वारा एक संसारिक प्राणी जज भी उसकी प्रार्थना स्वीकार नहीं करता है। तो हमारे शास्त्र के आदेशानुसार परमात्मा के समक्ष नारायण बलि हमारे जीवन के किए हुए कर्म को परमात्मा के समक्ष एक वकील की भांती रखता है। जिस पर बहस करता है और हमारी आत्मा की मोक्ष प्राप्ति में सहायक सिद्ध होता है। यही कर्म है जो मरने के बाद भी हमारे आत्मा को मित्रवत भाव से परमात्मा के समक्ष प्रदर्शित करता है। जिससे प्रसन्न होकर परमात्मा हमारी आत्मा को चरणानुरागी स्वीकार कर लेते हैं। यह तथ्य हमें आप सभी जिज्ञासु बन्धुओ को जागृत करने के लिए प्रदर्शित करना पड़ रहा है। हमें उम्मीद ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि किसी भी धर्म में उत्पन्न हुए व्यक्ति के जन्म से लेकर मरणलोपरान्त संस्कार में से अगर कोई भी संस्कार न हो सका हो तो मात्र यही संस्कार ही जीव को मोक्ष प्रदान करने में सक्षम है।

नारायण बलि संस्कार न करने से हानि : घर में उत्पन्न होने वाले बच्चो के अंदर कालसर्प दोष जैसा योग बनना, परिवार के सदस्यों का मानसिक संतुलन खोना, दुराचारी योग उत्पन्न होना, कन्याओ के द्वारा कुल की हानि करना, व्यापार में हर प्रकार से घाटा होना, घर में बच्चे व बच्चीयों के विवाह में विलम्ब होना, सामाजिक मान मर्दन होना, बहु बेटियों में वैधब्य योग तक आ जाता है आदि।

नारायण बलि संस्कार करने की विधि : यह संस्कार सप्त नदी के तट पर या दैवाल्य में या गौशाला में सम्पन्न कराया जाता है। इसमें भगवान नारायण के द्वादस अक्षर का मंत्र जप सवा लक्ष्य एवं 1100 से 11000 की संख्या में विष्णु सहस्र नाम का पाठ पितृ गायत्री का तैतीस हजार से सवा लक्ष्य के बीच में जप होने से जीव को शान्ति प्रदान होती है।

नारायण बलि संस्कार के लिए वेदी : चर्तुलिंगतोभद्र या द्ववादस लिंगतोभद्र, मण्डल, षोडस मात्रिका मण्डल, नवग्रह मण्डल, वास्तु मण्डल, क्षेत्रपाल मण्डल, पंचाग मण्डल आदि इन मण्डलों पर तैतीस करोड़ देवताओं का ध्यान, आहवन, पूजन करके जप यज्ञ सम्पन्न कराया जाता है।

निर्देशः नारायण बलि संस्कार शास्त्र ज्ञाता सिद्ध महा पुरूषों के संरक्षण में सम्पन्न कराने से किसी भी प्रकार की हानि की प्राप्ति नहीं होती है।